प्रस्तावना:-
कुण्डलिनी योग भारतीय योग और तंत्र परंपरा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह मानव के भीतर स्थित दैवीय शक्ति का प्रतीक मानी जाती है, जिसे जाग्रत कर साधक आध्यात्मिक विकास और मुक्ति की ओर बढ़ता है। कुण्डलिनी की धारणा कई योग और तांत्रिक ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में पाई जाती है। इनमें से योगवशिष्ठ, गोरक्षसंहिता, योगबीज, और सारस्वत कुण्डलिनी महायोग विशेष रूप से इनका उल्लेख किया गया हैं। इन ग्रंथों में कुण्डलिनी के स्वरूप का तुलनात्मक अध्ययन करना हमारे विषय का मूल उद्देश्य है।
AUTHOR’S Name:–श्री रामसागर यादव , डॉ. राघवेन्द्रभट्